अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव

शरद पूर्णिमा
  • मनाया जाता है: October
  • महत्व:

    पवित्र नगरी पन्ना जिले के सुप्रसिद्ध मंदिर श्री प्राणनाथ जी मंदिर में शरदऋतु की शरदपूर्णिमा पर हजारों व लाखों देशी व विदेशी श्रद्धालुओं के साथ प्रतिवर्ष अक्टूबर के महिने में श्री 108 प्राणनाथ ट्रस्ट के एवं प्रशासन के सहयोग से बडे ही धूमधाम से आयोजित किया जाता है । इस नौ दिवसीय महोत्सव की शुरूआत विजयादशमी के दिन श्री खेजडा मंदिर में वीरा व तलवार उठाकर होती है । यह वीरा व तलवार इस बात का प्रतीक है कि संवत 1740 में खेजडा मंदिर परिसर में बुंदेलखंड की रक्षा के लिए महाराजा छत्रसाल को इसी विजयादशमी के दिन श्री प्राणनाथ जी ने वरदानी तलवार सौंपी थी और आर्शीवाद दिया था कि
    “छत्ताो तेरे राज में धग धग धरती होय
    जित जित घोडा पग धरे तित तित फत्तेग होय”
    इस आर्शीवाद के परिणाम स्विरूप ही महाराजा छत्रसाल जी ने पूरे बुंदेलखण्डं पर विजय प्राप्तथ कर ली और अपना साम्राज्य स्थातपित कर पन्नास को अपनी राजधानी बनाया ।
    अंर्तराष्ट्री य शरद पूर्णिमा का मुख्य समारोह पूर्णिमा की रात्रि में होता है । रात्रि के करीब 12 बजे बंगला जी मंदिर में श्रीजी की सवारी ब्रम्हक चबूतरे में लाई जाती है । पूर्णमासी की महारास का उल्लािस रात्रि भर चलता है । श्रीजी की सवारी ब्रम्ह‍ चबूतरे पर पांच दिन तक रूकी रहती है । इस दौरान पांच दिन तक गरबा सहित विविध धार्मिक और सांस्कृबतिक कार्यक्रम का आयोजन चलता रहता है ।
    शरद पूर्णिमा महोत्स्व का पहला कार्यक्रम संवत 1740 में हुआ था । स्थाानीय धर्माविलंबियों के द्वारा बताया जाता है कि श्री प्राणनाथ जी बंगला जी मंदिर में अपने पांच हजार सुंदरसाथ के साथ ठहरे थे । पूर्णिमा की चांदनी रात में वे सुंदरसाथ के साथ श्रीकृष्ण द्वारा ग्वांलवालों व सखियों के साथ खेले जाने वाले महारास की चर्चा कर रहे थे । इसी दौरान उनके साथ आए सुंदरसाथ नें महामति प्राणनाथ जी से अखंड महारास का अनुभव कराने का निवेदन किया तब पूनम की आधी रात शुरू होने वाली थी । इस पर महामति प्राणनाथ जी नें पांच हजार सुंदरसाथ के साथ महारास खेलना शुरू किया । यह महारास पांच दिन तक बिना रूके, बिना थके चलता रहा । तभी से यह हर साल मनाया जाता है ।